Friday, February 6, 2009

I Witness!!

It is a warm feeling, to have a few old friends who have stayed back with you and who knows things about you, over the passing years in this fast paced world. I'm lucky in this respect. Few days back, an old good friend reminded me of an old poem of mine, through one of his comments on my earlier blog.

I still remember that day of my growing up years, when a sudden look into the mirror made me yearn for a witness to my life. And this poem (another of my first) was born to express this feeling. Having such accepting, non-judgemental witnesses to life, nurtures us... And I think this brings me into my profession... to offer it to others. But we may not be able to remain so at all moments of life!!

प्रिय,
तुम आओ,
ये मेरा नेह निमंत्रण है
तुम आना
और मेरे जीवन नाट्य में
उस द्रष्टा की तरह रहना
जो मेरे किरदार की अहमियत समझता हो

प्रिय
मुझे अपनी तालियों की
अनुगूंजों से
तुम विस्तार देना

अपनी संवेदना को मुझे प्रेषित करना
कभी अपने मौन से
तो कभी अपनी आंखों में छुपे उन भावों से
जिनका मुझे इंतज़ार है

परदों के उठने गिरने के बीच
चाहे मेरी भूमिका को अस्वीकार करो
पर खुले मन मस्तिष्क से
तुम मुझे स्वीकार करना

अगर तुम्हें पता है
पीडा क्या होती है
तो मध्यांतर में चले न जाना
अन्यथा संभव है
मेरी अंत तक खोजती निगाहों में
इंतज़ार कोई पढ़ ले

तुम,
तब भी रहना
जब सब जा चुके हों
तुम्हारे शब्द मुझे देंगे
एक नयी जीवन्तता

और तब,
उन खाली, उतरते गलियारे में
मैं तुमसे कह सकूंगी
तुम मेरी भूमिका हो
और शायद तुम्ही
सूत्रधार!

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